
मौलिक कहानियाँ
एक कुघू, दो चुंबन, तीन शुभ रात्रि
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टिप, टिप, टिप, टिप—बारिश आ गई! नुआन दरवाज़े से बाहर कदम रखने ही वाली थी कि दादी बुआ ने हथेली उठा दी। “पहले छज्जे के नीचे रुको।” बारिश आई—सबसे पहले कौन रुकेगा? “नुआन रुकेगी!”
दादी ने छाते को नुआन से दूर किया और उसे खोल दिया—फट्! बारिश आई—छाता कौन खोलेगा? “दादी खोलेंगी!” नुआन ने छाता पूरा खुलने तक इंतज़ार किया, फिर दादी के पास आ गई।
नुआन ने दादी के बैग से जुड़ा कपड़े का फंदा पकड़ा। दोनों एक ही छाते के नीचे आ गईं। बारिश आई—छाते के नीचे कौन है? “नुआन और दादी!” पास-पास, साथ-साथ—एक छाता दोनों के लिए बिल्कुल सही।
गीला रास्ता चमक रहा था। आगे पानी का एक छोटा गड्ढा था। नुआन और दादी न दौड़ीं, न कूदीं। दोनों धीरे-धीरे उसके चारों ओर चलीं। बारिश आई—धीरे कौन चलेगा? “हम दोनों!” धीरे-धीरे, छोटे से छप्पर तक।
घर लौटकर दादी छज्जे के नीचे खड़ी हुईं, बूंदें हल्के से झाड़ीं और छाता बंद कर दिया—फट्। बारिश रुकी—छाता कौन बंद करेगा? “दादी करेंगी!” नुआन ने छाते के स्टैंड की ओर इशारा किया। “यहाँ आराम करो। किसी और दिन फिर खुलना।”
बारिश शुरू होने पर छोटे बच्चे सूखी जगह पर रुककर किसी बड़े से छाता खुलवा और बंद करवा सकते हैं, उनके पास रह सकते हैं और गीले रास्ते पर धीरे चल सकते हैं।
नुआन और दादी बुआ घर से निकलने ही वाली थीं कि बारिश शुरू हो गई। वे बारिश के सुरक्षित नियमों को सवाल-जवाब का खेल बना लेती हैं: छज्जे के नीचे रुकना, दादी से छाता खुलवाना, साथ-साथ धीरे चलना और लौटकर उसे सुरक्षित रखना।
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