
मौलिक कहानियाँ
तारा लेफ पर पानी बरसात
⏱ 2–4 मिनट
हर शाम फ्राई और दादी एक ऊँचे यांग पेड़ के नीचे फर्न से घिरे गड्ढेनुमा बसेरे में सोती थीं। आज रात नन्ही काकड़ हिरनी ने सोचा, “जंगल के सोने से पहले कौन-सी आवाज़ सबसे आखिर में आती है?” उसने पत्तों की मुलायम चादर ऊपर खींची और ध्यान से सुना। एक छोटी चिड़िया ने घोंसले में लौटने से पहले आख़िरी सुर लगाया। फ्राई ने फुसफुसाकर कहा, “यही आख़िरी आवाज़ होगी।”
चिड़िया चुप हुई तो पानी के छोटे ताल के पास एक मेंढक बोला, “टर्र... टर्र...” फ्राई ने दो बार गिना और इंतज़ार किया। मेंढक के रुकते ही हवा बाँस से टकराई, “सर्र... सर्र...” फ्राई ने पत्तों का तकिया ठीक करते हुए और ध्यान से सुना। उसने तय किया, “तो बाँस की आवाज़ ही आख़िरी होगी।”
बाँस शांत हुआ, फिर भी छोटी धारा कलकल करती रही। और दूर से एक उल्लू ने एक बार पुकारा। फ्राई ने आह भरी। “आख़िरी आवाज़ मुझसे बार-बार दूर भाग जाती है।” दादी ने आँखें खोलीं और मुस्कराईं। “शायद जंगल हर आवाज़ बंद करके नहीं सोता।”
दादी ने फ्राई से कहा कि वह फिर सुने, लेकिन किसी आवाज़ को विजेता बनाने की जल्दी न करे। मेंढक की आवाज़ कह रही थी कि ताल वहीं है। बाँस की आवाज़ कह रही थी कि हवा गुज़र रही है। धारा की आवाज़ कह रही थी कि पानी अब भी सफ़र कर रहा है। हर आवाज़ धीरे-धीरे दूर और धीमी होती गई। फ्राई को किसी आवाज़ को पकड़े रखने की ज़रूरत नहीं थी। वह हर परिचित आवाज़ को पहचानकर उसे गुज़र जाने दे सकती थी।
फिर फ्राई ने सबसे पास की आवाज़ सुनी—अपनी धीमी साँस अंदर लेने और लंबी साँस बाहर छोड़ने की आवाज़। उसके पास दादी भी एक समान लय में साँस ले रही थीं। जंगल में अब भी आवाज़ें थीं, लेकिन फ्राई का शरीर गर्म, भारी और आरामदेह लगने लगा। वह बुदबुदाई, “कोई आख़िरी आवाज़ होना ज़रूरी नहीं है,” और जंगल की फुसफुसाहट के बीच सो गई।
आराम करने के लिए दुनिया के पूरी तरह शांत होने का इंतज़ार ज़रूरी नहीं है। हम परिचित और सुरक्षित आवाज़ों को पहचानकर अपने शरीर को धीरे-धीरे ढीला छोड़ सकते हैं।
नन्ही काकड़ हिरनी फ्राई जंगल के सोने से पहले की आख़िरी आवाज़ सुनने की कोशिश करती है। जब भी उसे लगता है कि वह आवाज़ मिल गई, उसके बाद एक और धीमी आवाज़ आती है। आखिर में दादी उसे समझाती हैं कि जंगल पूरी तरह शांत हुए बिना भी आराम कर सकता है—और वह भी।
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